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Thursday, October 8, 2020

अमिताभ बच्चन के शानदार अभिनय ने लूटी महफिल

 अमिताभ बच्चन और आयुष्मान खुराना की फिल्म 'गुलाबो सिताबो' अमेजन प्राइम पर स्ट्रीम हो चुकी है। लॉकडाउन की वजह से यह फिल्म थियेटर्स में ना रिलीज होकर ओटीटी प्लेटफॉर्म पर रिलीज की गई। इस फिल्म को लेकर अच्छा खासा बज़ है। फैमिली एंटरटेनर कहकर प्रमोट की गई शूजित सरकार की फिल्म 'गुलाबो सिताबो' कैसी है आइए जानते हैं। 


कहते हैं लालच का फल बुरा होता है, लेकिन इसे जानते हुए भी लोग मानने को तैयार नहीं होते हैं। जूही चतुर्वेदी के द्वारा लिखी गई फिल्म 'गुलाबो सिताबो' भी इसी लालच पर बेस्ड है। पुराने लखनऊ में ऐसे कई किस्से हैं, जहां किराएदार 50-60 सालों से रह रहे होते हैं और फिर धीरे-धीरे उस मकान पर कब्जा कर लेते हैं। कुछ ऐसे ही किस्सों से सजी फिल्म है गुलाबो सिताबो। जिसमें मिर्जा यानी कि अमिताभ बच्चन को अपनी पुरानी हवेली का लालच जो कि उससे 17 साल बड़ी बेगम के नाम है। वहीं बांके (आयुष्मान खुराना) को लालच है कि कैसे वो हवेली में रहे और उसे किराया भी ना देना पड़े। फिल्म की शुरुआत से ही दोनों में चूहे-बिल्ली की लड़ाई चलती रहती है। जहां मिर्जा अपनी बेगम के मरने का इंतजार करता है और प्रॉपर्टी अपने नाम कराने की कोशिश करता है, वहीं दूसरी तरफ बांके कोशिश करता है कि पुरातत्व विभाग वाले इस बिल्डिंग पर कब्जा कर लें जिससे उसे रहने के लिए घर मिल जाए और बूढ़े मिर्जा की प्रॉपर्टी उससे छिन जाए। पूरी फिल्म में ऐसे ही नोंक झोंक चलती रहती है, बीच बीच में हंसी की फुहार भी चलती है। लेकिन क्या ये फिल्म लोगों को पसंद आएगी?



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फिल्म शुरुआत से लेकर अंत तक एक वही फातिमा हवेली को लेकर चलती है, जो बीच बीच में हमें बोरियत का एहसास भी कराती है, बॉलीवुड मसाला फिल्मों के शौकीन शायद इस फिल्म को पसंद ना करें। फिल्म में विजय राज, ब्रजेन्द्र काला, और फार्रूख जफर जैसे तमाम उम्दा कलाकार हैं, लेकिन ऐसा लगता है कि इनके टैलेंट का ठीक तरह से इस्तेमाल नहीं हुआ। सृष्टि श्रीवास्तव जरूर निखरकर सामने दिखी हैं।


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अमिताभ बच्चन ने इस फिल्म में प्रोस्थेटिक का इस्तेमाल किया था, उनकी नकली नाक साफ पता चलती है जो अखरती है। हालांकि अभिनय की बात करें तो पूरी लाइमलाइट अमिताभ बच्चन ले गए। इस उम्र में इतना शानदार काम सिर्फ वही कर सकते हैं। अमिताभ के आगे आयुष्मान खुराना जरूर धूमिल हो गए। उर्दू बोलने में आयुष्मान को जो मशक्कत करनी पड़ रही थी वो भी समझ में आ रहा था। 


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फिल्म का कैमरा वर्क अच्छा है, जो पुराने लखनऊ को करीब से दिखाता है। फिल्म में पपेट शो दिखाया गया है, जो काफी इंटेस्टिंग तरीके से फिल्म को आगे बढ़ाता है।


फिल्म का क्लाइमैक्स जरूर शानदार है और अनएक्सपेक्टेड है, जो आपको हंसाएगा। हल्की फुल्की फिल्में देखने के शौकीन हैं, तो आपको यह फिल्म पसंद आएगी, अगर आप बॉलीवुड मसाला फिल्में पसंद करते हैं तो शायद आपको इस फिल्म से निराशा होगी। इंडिया टीवी इस फिल्म को देता है 5 में से 2.5 स्टार।

कमजोर स्क्रीनप्ले के साथ भी रश्मि देसाई

 Tamas Movie review: रश्मि देसाई और अध्विक महाजन की शॉर्ट फिल्म 'तमस' लंबे समय से चर्चा में थी। आखिरकार आज यह फिल्म रिलीज हो गई है। 23 मिनट की यह शॉर्ट फिल्म हमें इंसानियत का पाठ पढ़ाती है। यह कहानी ऋषि नाम के एक लड़के की है जो लॉकडाउन और गर्लफ्रेंड से ब्रेकअप की वजह से परेशान है। ऐसे में उसकी मदद करती है पड़ोस में रहने वाली लड़की साइना। ऋषि की मेंटैलिटी ऐसी है कि उसे मुसलमानों से नफरत है, फिल्म में एक सस्पेंस भी है।



यह फिल्म उन लोगों पर चोट करती है जो धर्म और जाति की वजह से लोगों में फर्क करते हैं और अपने करीबी दोस्तों का भी मजाक उड़ाने से पीछे नहीं रहते हैं। यह फिल्म आपको जरूर देखनी चाहिए और लोगों को भी दिखानी चाहिए।



अभिनय  की बात करें तो रश्मि देसाई थोड़े समय के लिए स्क्रीन पर आती हैं लेकिन अपने अभिनय और चार्म से शोभा बिखेरती हैं। उनका अभिनय बेहद नेचुरल लगा है। अध्विक भी  अभिनय में बेहद नेचुरल लगे हैं। लेकिन फिल्म का स्क्रीनप्ले कमजोर था, इस कहानी को  और बेहतर तरीके से प्रस्तुत किया जा सकता था।


कमजोर कड़ियां:

दीवार के इस पार से आपस में बात करना ठीक है लेकिन दीवार के उस पर लड़की के हाथ में फोन है और लड़का इस पार से फोन पर घरवालों और दोस्तों से बात करता है ये थोड़ा अजीब लगता है।

फिल्म बहुत ही प्रिडिक्टिबल है, शायद फिल्म के पोस्टर में रश्मि देसाई का लुक दिखा दिया गया है इसलिए।

ब्रीद इनटू द शैडोज

 अभिषेक बच्चन के डिजिटल डेब्यू वाली ब्रीद-इनटू द शैडोज रिलीज हो चुकी है। मयंक शर्मा के निर्देशन में बनी ये क्राइम बनाम साइकोलॉजिकल थ्रिलर सीरीज है वही चूहे बिल्ली की भागमभाग कहानी लेकर सामने आई है, जिसे आप कई फिल्मों में देख चुके हैं। फिल्म की कहानी एक बच्ची के खोने और उसके बाद के घटनाक्रमों पर लिखी गई है लेकिन चूंकि कई विदेशी सीरीज में ऐसी कहानी लोग देख चुके हैं इसलिए इसे नया तो नहीं कहा जा सकता है लेकिन नए तरीके से परोसा गया जरूर कह सकते हैं। सच कहूं तो मुझे सीरीज से ज्यादा अच्छा सीरीज का ट्रेलर लगा जिसमें सीरीज की अपेक्षा ज्यादा कसावट और सस्पेंस था।



ब्रीद सीजन 1 में काम कर चुके अमित साध ने पिछली बार के मुकाबले बॉडी ज्यादा अच्छी बनाई है, इस बार वो हंसे भी हैं लेकिन पिछले सीजन से तुलना की जाए तो वो ज्यादा बेहतरी नहीं ला पाए हैं। हालांकि फिर भी उनका किरदार आपको रोकता है, कुछ देर और स्क्रीन को घूरने के लिए। अमित साध के अलावा जिस एक्टर के लिए फिल्म की चर्चा लगातार हो रही थी वो हैं अभिषेक बच्चन, हालांकि उन्होंने अपने किरदार में जान फूंकने की पूरी कोशिश की है लेकिन अभिषेक अपनी पहली सीरीज में कुछ जादू चलाने में कामयाब रहे हों, ऐसा लग नहीं रहा। आपने रिफ्यूजी देखी होगी तो समझ जाएंगे कि सारा खेल चेहरे की भाषा पर टिका है।  अदाकारी की दुनिया में आपकी कदकाठी या नाम नहीं बल्कि चेहरे की अदायगी ज्यादा मौजूं होती है। आप कुछ भी बन जाइए, पुलिसवाला, चोर या साइकाट्रिस्ट, लेकिन वो किरदार जब तक चेहरे पर नहीं आएगा आप अदाकारी का एक्जाम पास नहीं कर पाएंगे। अभिषेक पूरी फिल्म में सुलझे और उलझे दोनों लगते हैं, उनका बोलने का अजीब रूआबदार अंदाज भी कुछ अजीब सा फ्रेम बनाता है सीरीज में। 


अगर पहले और दूसरे सीजन के मुख्य किरदारों की बात करें तो अभिषेक पिछले सीजन में कमाल दिखा चुके आर माघवन के आगे पासंग भी नहीं ठहर पाएंगे। हालांकि अमित साध ने उम्मीद नहीं तोड़ी है लेकिन बहुत शानदार कर डाला है ऐसा कुछ लिखना बेमानी हो जाएगा।


कहानी की बात करें तो अविाश और आभा अपनी छह साल की बेटी के साथ हंसी खुशी रहते हैं औऱ एक दिन बच्ची गायब हो जाती है। काफी दिन बाद पता चलता है कि बच्ची जिंदा है और उसे किडनैप किया गया है। किडनेपर चाहता है कि बच्ची का पिता यानी अविनाश उसके कहने पर कुछ मर्डर करे। पहले मर्डर के बाद एंट्री होती है इंसपेक्टर कबीर सावंत की, जिसे आपने पिछले सीजन में देखा होगा लेकिन ये कबीर सावंत का अपडेट वर्जन कह सकते हैं। फिर हत्याएं होती रहती हैं औऱ किरदार उलझते रहते हैं एक दूसरे के बीच। अंत तक कई सस्पेंस पता चलते हैं लेकिन ऐसा लगातार लगता है कि नयापन नहीं है, पहले देख चुके हैं।  

नित्या मेनन ने सीरीज में एक डरी हुई मां के किरदार को निभाया है। वो हर बात पर कंफ्यूज्ड दिखती है। उन्हें औसत कहा जा सकता है। 


डायरेक्शन की बात करें तो ये ठीक ठाक है। कहानी भले ही पुरानी हो लेकिन कहने का अंदाज कुछ अलग है। चूंकि कहानी भी मंयक शर्मा ने लिखी है और डायरेक्शन भी उन्हीं का है तो उनके ही पैंतरे की छाप सीरीज पर दिखी है। ऐसा कहना सही नहीं कि डायरेक्शन बिलकुल बेकार है लेकिन अतार्किक घटनाक्रम और बेवजह के दृश्यों की वजह से सीरीज को देखने की कंटीन्यूटी कमजोर होती है बीच में कई जगह पर। 


फिल्म में छह साल की सिया के किरदार को निभाया है इवाना कौर ने। इस बच्ची ने भी शानदार काम किया है। इसमें एक बच्ची की मासूमियत, डर और भावनाओं के जो जो एंगल उसके हिस्से में आए,सबको खूबसूरती से निभाया है। बेक ग्राउड म्यूजिक की बात करें तो आपने पिछला सीजन देखा होगा तो कुछ निराश हो सकते हैं। फिल्म के अन्य कलाकारों में सैयामी खेर ने काफी अच्छा काम किया है। हालांकि उनके हिस्से में सीन कम आए हैं लेकिन जहां भी जब भी वो दिखी हैं, उन्होंने इंप्रेस किया है। 


सपोर्टिंग एक्टरों ने फिल्म में आश्चर्यजनक तौर पर शानदार काम किया है। ऋषिकेश जोशी, श्रुति बापना, रेशम श्रीवर्धनकर को अगर ज्यादा स्क्रीन स्पेस दिया जाता तो फिल्म शानदार हो सकती थी। इन सभी कलाकारों ने फिल्म की नाव में छेद ढकने वाले पत्थरो का काम किया है। श्रद्धा कौल को पुलिस वाली के तौर पर ज्यादा स्पेस मिलता तो वो वाकई नित्या मेनन पर भी भारी पड़ जाती। 


ब्रीड का सैकेंड सीजन आपको सस्पेंस का थ्रिलर राइड तो करा रहा है लेकिन ये राइड बिना पानी वाले पूल की तरह है। आपको रोमांच के छींटे नहीं लगेंगे। आप डायरेक्शन में रोंगटे खड़े कर देने वाली असल रोमांच की तरावट से महरूम रह जाएंगे। मुख्य किरदारों की जिंदगी में डर, बेचैनी और जद्दोजहद जो कहानी के अनुरूप दिखना चाहिए, वो कहीं नहीं दिख रहा। ऐसी राइड किस काम की जहां आप झूले पर झूले लेकिन पूल में पानी न हो। 


सीरीज में लीड रोल अभिषेक बच्चन का है लिहाजा उनकी बात करनी ज्यादा जरूरी हो जाती है। अभिषेक को समझना होगा कि बेव सीरीज  फिल्म नहीं होती, इसका दर्शक अभी तक अलग है। जो रात को ठीक 12 बजे जागकर एक साइकोलॉजिकल फिल्म देख रहा है वो मसाला फिल्मों को कैसे ट्रीट करता होगा। इसी दर्शक को रात को बारह बजे अगर टेस्ट के मुताबिक डोज न मिले तो बेव सीरीज फेल हो जाती है। इसलिए बेव सीरीज को हॉल में लगी फिल्म की तरह समझना भूल होगी। अभिषेक बच्चन के लिए यहां कई रास्ते हैं, वो चाहें तो अच्छा कर सकते हैं लेकिन इसके लिए उन्हें अदायगी पर ज्यादा काम करना होगा। कोशिश करते रहेंगे तो सफल भी हो जाएंगे। 

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